Holi Information in Hindi – होली क्या है?

रंगों का त्यौहार यानी “होली” की संपूर्ण इन्फोर्मेशन यहाँ दी गयी है. होली यह एक ऐसा त्यौहार है. जिसे किसी भी जाती, धर्म, समुदाय में नहीं तोला जाता. यह पर्व सभी भारतीय मिल जुटकर मनाते है. आप होलिका या फिर धुलंडी के दिन रंग खेलना तो जानते है. लेकिन क्या आप होली क्या है? क्यों मनाई जाती है? होली के पीछे की कहानी, महत्व एवं इतिहास के बारे में जानते है? शायद नहीं. पर आज हर एक सवाल के ऊपर से पर्दा उठने वाला है.

होली की संपूर्ण इनफार्मेशन
होली

होली का नाम सुनते ही मन में उल्लास, हर्ष और मस्ती की भावना निर्माण होती है. क्योंकि इस दिन बड़े से लेकर छोटा ऐसा भेद नहीं किया जाता. हर व्यक्ति, हर रिश्ता इस उत्सव में हिस्सा लेता है. इस त्यौहार को मानते वक्त हर मन में यही भावना होती है. की, हमारी जिंदगी भी ऐसे ही खुशिवो के रंगों से भर जाए.

होली क्या है?

होली यह भारतीय प्रमुख त्योहारों में से एक है. जिसे फगुआ, धुलेंडी, होलिका, दौल बसंत पंचमी के नाम से भी जाना जाता है. विभिन्न राज्य में इसे विभिन्न नामो से जाना जाता है. जैसे महाराष्ट्र(रंगपंचमी), पश्चिम बंगाल(डोल पोर्णिमा), गुजरात (गोविंदा होली), हरियाणा (धुलेंडी), तमिलनाडु (कामन पोडिगई), कर्नाटक (कामना हब्बा), पंजाब (होला मोहल्ला), बिहार (फगुआ), गोवा(शिमगो), आदि.

होली यह पर्व प्रत्येक वर्ष वसंत ऋतू में फाल्गुन यानी मार्च महीने में मनाया जाता है. विशेष रूप से इस
उत्सव को पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. साथ ही यह पर्व दो दिनों के लिये मनाया जाता है. पहले दिन होलिका को जलाया जाता है. जिसे “होलिका दहन” कहा जाता है. दुसरे दिन एक दुसरे के साथ रंग खेले जाते है. जिसे “धुलेंडी या धुलिवंदन” कहते है.

होली क्यों मनाई जाती है? होली का इतिहास एवं कथा

हर पर्व और त्यौहार को मनाने के पीछे कोई न कोई कारण होता है. ख़ास करके इन उत्सव के पीछे पौराणिक कथावो का रहस्य छुपा होता है. ठीक इस प्रकार होली के पीछे भी कही सारे काथाये प्रचलित है. लेकिन सभी कथावो में भक्त प्रल्हाद और होलिका की कहानी सबसे प्रसिद्ध है.

विष्णु पुराण पर आधारित कथा के अनुसार, प्राचीन भारत में हिरण्यकश्यप नाम का राजा था. जो की एक बहुत की क्रूर और भयानक राक्षस था. हिरण्यकश्यप अपने भाई के मौत का बदला लेना चाहता था. उसके भाई का वध स्वयं भगवान विष्णु ने किया था. बदले के भावना में और स्वयं को बलशाली बनाने के लिये; हिरण्यकश्यप ने वरदान प्राप्त करने के लिये ब्रम्हदेव को पूजना शुरू कर दिया. अथक परिश्रम, समर्पण और त्याग से उसने ब्रम्हदेव से वरदान प्राप्त कर लिया. उसने ऐसा वरदान प्राप्त किया. की, उसे कोई भी जानवर या पशु, दिन हो या रात हो, ना शस्त्र और ना शास्त्र, ना आकाश न धरती, घर के बाहर या अन्दर कोई भी उसका वध नहीं कर सकता.

वरदान मिलने के कारण, यह असुर और भी क्रूर और निर्दयी हो गया. अपने आपको भगवान समझने लगा. अपने प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार करने लगा. उसके साम्रज्य के लोग विष्णु को बहुत पुजते थे. लेकिन इस राक्षस से सभी लोगो के ऊपर अत्याचार करके लोगो को उसको पूजने पर मजबूर कर दिया.

लेकिन इस दैत्यराज हिरण्यकश्यप को प्रल्हाद नाम का एक पुत्र भी था. बालक प्रल्हाद राक्षस कुल से होने के बावजूत विष्णु का परम भक्त था. हिरण्यकशप ने प्रजा को तो मना लिया था. लेकिन कई अत्याचार, छल के बावजूत भी वो अपने पुत्र की भक्ति को नहीं तोड़ सका. उसने अपने पुत्र को कही तरीके से जताया. की, वो विष्णु को बिलकुल ना पूजे. में भगवान हूँ! सिर्फ मेरा पूजन करो. लेकिन प्रल्हाद कहा मानने वाला था.

आखिरकार, उसने प्रल्हाद को मारने की सोच ली. इस षड्यंत्र में उसने अपने बहन “होलिका” की मदत ली. होलिका ने भी भगवान् शिव से वरदान हासिल किया था. महादेव ने होलिंका को ऐसा वस्र दिया था. जिसे पहने पर कोई भी आग में नहीं जल सकता था. योजना के तहत, हिरण्यकश्यप ने होलिका को प्रल्हाद को आगे गोद में रखकर बैठने को कहा था. असल में उनकी योजना प्रल्हाद को जालाने की थी. उनकी सोच के अनुसार, अगर आग बरसाई जाए. तो इसमें सिर्फ प्रल्हाद ही जलकर भस्म हो जाएगा. जबकि होलिका वरदान प्राप्त वस्र के कारण बच जायेगी.

योजना को पूरा करने के लिये होलिकाराक्षिसी अपने भाई के पुत्र को लेकर गोद में बैठ गयी. तब भक्तप्रल्हाद विष्णु जी का जाप कर रहा था. अगले कदम के तहत हिरण्यकश्यप ने इन दोनों के ऊपर अग्नि बरसायी. लेकिन अपने परम भक्तो को बचाना विष्णुजी का दारित्व था. इसीलिये जैसे ही असुर ने आग बरसाई विष्णु ने वहासे तेज हवा को बहा दिया. जिस्से होलिका के शरीर का वस्त्र प्रल्हाद के शरीर पर आ गया. जिस कारण होलिका पूरी तरह से अग्नि में भस्म हो गयी. और प्रल्हाद पूरी तरह से सुरक्षित बच गया.

इस घटना के बाद ही हिन्दू धर्म के लोगो ने होली को मनाना शुरू किया. पहले दिन गोबर, गन्ने, और कुछ लकडियो के सहारे “होलिका दहन” किया जाता है.

रंगों को होली क्यों?

होलिका दहन का समझ आ गया. लेकिन रंगों की होली क्यों खेली जाती है?

इसका कारण भी शास्त्रों में बताया गया है. जरसल भगवान विष्णु के अगले अवतार कृष्ण से इसकी शुरवात की गयी. कहा जाता है. की गोकुल में कृष्ण अपने सथिवो, और राधा जी के साथ रंगों से होली खेलते थे. तभीसे यह उत्सव “रंगों क त्यौहार” के परिचय से लोकप्रिय हो गया.

होली का त्यौहार कैसे मनाते है?

अलग – अलग राज्य में विभिन्न तरीकेसे और परंपरा से होली मनाई जाती है. परंतु उत्तर भारत में अधिक जल्लोष से यह उत्सव सेलिब्रेट किया जाता है. कही जगह पर 2 दिन, कही जगह पर 7 और कही स्थानों पर पुरे महीने भर होली त्यौहार मनाया जाता है. उत्तर भारतीय होली का त्यौहार देखने के लिये गोकुल, वृन्दावन और ब्रज जैसे धार्मिक क्षेत्रो में जाते है.

उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित ब्रज में अनोखे ठंग से होली मनाई जाती है. जरसल ब्रज के पुरुष अपने पत्नियों को रंग लगाते है. लेकिन महिलाये अपने पतिदेव की दंडो से खूब पिटाई करती है.

दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के कुछ क्षेत्र में भांग पिने का रिवाज है. जरसल भांग दिखता तो दूध जैसा, लेकिन इसे पिने से नशा आता है. और होली के दिन इसका सेवन करके, लोग मधहोशी में जश्न मानते है.

महाराष्ट्र में रंग पंचमी को अधिक महत्व दिया है. जिसे बाकि प्रदेशो में धुलेण्डी के नाम से जाना जाता है. यहा के लोग टोली और ग्रुप बनाकर एक दुसरे को रंग लगाते है. साथ ही “बुरा न मानो होली है” ऐसा नारा लगाते है. होलिका दहन के दिन इस राज्य में पूरण पोली बनायीं जाती है.

निष्कर्ष:- तो मित्रो मैंने इस आर्टिकल में आपको होली के बारे बताया. में उम्मीद करता हूँ. की, यह लेख आपको बहुत पसंद आया होगा. और अगर आप चाहते हो. की हमारे संस्कृति और रिवाज के बारे में लोगो को पता चले. तो कृपया अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में इस लेख को शेयर कीजिये.