किसान पर आत्मकथात्मक निबंध | Essay on Kisan Ki Atmakatha In Hindi

यहापर आज हम किसानी की आत्मकथा पर निबंध देखेंगे. जैसे की आप जानते होंगे. हमारा भारत देश एक कृषिप्रधान देश है. हमारे देश के किसानों को हम अन्नदाता कहते है. लेकिन हमारा अन्नदाता आज कुछ परेशानियां का सामना कर रहा है. उसके व्यथा को जानने के लिये इस लेख में हम किसान पर आत्मकथात्मक निबंध दिया गया है.

Essay on kisan ki atmakatha
किसान की आत्मकथा

जय जवान जय किसान का उद्घोष जब हम सुनते है. तो हमे हमारे अपने भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री का स्मरण आ जाता है. जिन्होंने किसान परिवार में जन्म लिया और प्रधानमंत्री बनने तक किसान ही रहे. किसान हमारे अन्नदाता हैं और किसान अगर मेहनत न करे तो हम अपने पेट भरने की कल्पना भी नही कर सकते.

क्या आप जानते है? हमारी 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है.

लेकिन आज इतने बड़े आबादी वाले किसानो के समस्या को कोई सुननेवाला नहीं है. अगर किसान खेती करना और फसल उगाना बंद करेंगे तो हमें खाने के लिये अनाज ही उपलब्ध नहीं होगा. इसी समस्या को देखते हुये स्कूल में किसान के ऊपर निबंध देकर उनके व्यथा जानने के लिये प्रयास किया जाता है. तो चलिये समय न गवाते हुये essay on kisan ki atmakatha को देखते है.

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किसान की आत्मकथा निबंध – 1

में एक भारतीय किसान हूँ और मेरा नाम रामनाथ है. उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के एक छोटे से गांव में मेरा जन्म हुआ था. मेरे पिता एक औसत दर्जे के किसान थे. माता जी धार्मिक वृत्ति वाली सीधी साधी महिला थी. 

जब में बड़ा हुआ, तो पिताजी ने गांव के पाठशाला में मेरा पंजीकरण किया. में पढ़ाई के मामले में एक साधारण व्यक्ति ही था. लेकिन खेल-कूद के मामले में अव्वल था. यानी पढ़ाई से ज्यादा मन मेरा मैदान में लगता था. कुछ समय बाद मैं हाईस्कूल परीक्षा में प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण हो गया. लेकिन उसके थोड़े ही दिन में रिश्तेदारों के दबाव में आकर पिताजी ने मेरी शादी कर दी. 

उसी साल एक गंभीर बीमारी के चलते मेरे पिताजी की मृत्यु हो गयी. पिताजी का क्रियाकर्म संपन्न होते ही घर में बँटवारे की बातचीत तेजी पकड़ने लगी. मेरे दो भाई थे, उन्होने खेती-बारी का बँटवारा कर मुझे अलग कर दिया. अब मेरे सर पर माँ तथा पत्नी का भरण-पोषण करने का भार आ पड़ा. इसी वजह से में नौकरी के तलाश में शहर गया. लेकिन काफी ठोकरे खाने के बाद में घर वापस आ गया. क्योंकि हाईस्कूल तक ही पढ़ाई होने के कारण मुझे नौकरी ही नहीं मिली. दर-दर भटकने के बाद भी आखिर में मेरे हात में निराशा ही नसीब हुयी. फिर मैंने अपनी पुश्तैनी खेती-बारी संभालने का ही निश्चय किया. 

पहले कभी खेती नहीं संभाली थी. जिस कारण शुरू-शुरू में मुझे काफी सारी परेशानियाँ का सामना करना पड़ा. आज की रासायनिक उर्वरकों, किटकनाशको, बीज-बियाने, आदि महंगी सामग्रियां बहुत ही महंगी हुयी है. इसीलिए किसी भी फसल को उगाने के लिए पहले काफी सारा रुपया खर्च करना पड़ता है. कभी-कभी प्राकृतिक आपदाओं से भी झूझना पड़ता है. जैसे कभी बाढ़ से तो कभी सूखा पड़ जाने से, खेत में खड़ी फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाती है. इतना सब होने के बावजूद भी यदि कुछ उत्पादन बच भी जाता है, तो बाजार में सरकार और व्यापारी माल का अच्छा दाम नहीं देते. सीधे शब्द में कहे तो खेती करना एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमे मुनाफा होना बहुत मुश्किल है. इसीलिए तो आज-कल के मेरे जैसे किसान “खेती करने में क्या रखा है?” ऐसा कहकर आने वाले पीढ़ी को खेती से दूर रहने की सलाह देते है. 

कभी-कभी सोचता हूँ. जब हम कड़ी धुप और बारिश में मेहनत करते है और ग्रामीण भागों में खेती करके अनाज उगाते है. तभी शहरों में रोटी और दाल खाने को मिलती है. मतलब एक किसान सरकारी अफ़सर से लेकर नौकरदार तक के सभी लोगो का अन्नदाता है. फिर भी में और मेरे जैसा किसान खुश क्यों नहीं है? नौकरी करने वाले इंसान को पंखे के नीचे बैठकर भी महीने का ३०,००० रुपया मिल ही जाता है. परंतु वहीं पर में पूरे साल मेहनत करके एक एकड़ से सिर्फ २५००० हजार रुपये की ही आमदनी कर लेता हूँ. तो कैसे जियेंगे हम? कहने के लिए तो में एक अन्नदाता हूँ. परंतु जब  बाढ़ आने पर फसल बेकार चली जाती है तब परिवार को दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करने के लिए मुझे मुश्किल होती है. 

ईश्वर के कृपा से मुझे दो पुत्र है. और एक पिता होने के नाते में यह बिलकुल ही नहीं चाहता. की मेरे पुत्र का भविष्य भी मेरे जैसा ही हो. चाहे कुछ भी हो जाए में अपने बच्चों को खूब पढ़ाऊंगा. ताकि उनका भविष्य उज्वल हो जाये.

सरकार कुछ ना कुछ योजनाये तो हम जैसे किसानों के लिये लाती रहती है. पर देश में बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण वो योजनाएं हम तक पहुँचती ही नहीं. लेकिन सरकार को किसानों की समस्या पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. गांव में बेरोज़गारी और बेकारी पर अंकुश लगाने के लिए लघु उद्योग तथा कुटीर उद्योग डालने में किसानों को प्रोहत्सान देना चाहिए. वैसे ही गाँव में पेयजल, शिक्षा, बिजली, अस्पताल जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए. तभी यहाँ के किसान आनंद और कम परेशानी से अपना जीवन व्यतीत कर पाएंगे. 

क्योकिं जब गाँवो और किसानों में खुशियाली का माहौल होगा. तभी देश की प्रगति और विकास होना संभव होता है.  

किसान की आत्मकथा निबंध – 2

मैं राम मनोहर जोशी मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव का गरीब मेहनती किसान हूँ. सुबह से ले कर शाम तक अपने खेत मे काम करता हु. बारिश हो ठंडी या हो वैसाख की कड़ी तपती धूप हो, मैं सब सहन करके फसल को तैयार करता हु.

अपना तथा अपने बच्चों का पेट पालने का एक ही सहारा है. वो है खेती लेकिन दुख एक बात का है. की इतनी मेहनत और संघर्ष करने के बावजूद सरकार जब हमारी फसल का मूल्य सही नही देती तब  मन मे बहुत पीड़ा होती है. लेकिन हम मजबूर है हम किसी के सामने हाँथ फैलाने से अच्छा काम करना पसंद करते है.

 हम गरीब ज़रुर है मगर स्वाभिमान के प्रति समझौता नही कर सकते. हम डटे रहते है पीड़ा सहन करते रहते है मगर किसी के भी आगे हाँथ नही फैलाते. क्योंकि हमे ईश्वर पर भरोसा है. की वो  ईमानदारी और निष्ठा का सम्मान करेंगे और हमे उसका फल ज़रूर मिलेगा. ऐसी भरोसे के साथ हम अपनी पीड़ा को भूल कर फिर अपने काम पर लग जाते है और अपनी अगली फसल के बुआई , जोताई, निराई, गोड़ाई में लग जाता है.

जैसे कोई छात्र फैल होने के बाद, अपने अगली परीक्षा में फैल न हो इसके लिए पहले से ज्यादा मेहनत करता है. उसी प्रकार हम भी नये से काम को लग जाते है. इसी आशा में की अगली फसल की पैदा वार अधिक होगी. जिससे पिछली फसल में हुये नुकसान का कुछ हिस्सा निकल आये. जिससे थोड़ा कर्ज कम हो जाए बस.

मेरी भी अपेक्षा, आशायें और मेरा भी मन है.

मेरी भी इच्छा होती है. की मेरी फसल हमेशा लहलहाती रहे और नुकसान कम हो. ईश्वर खूब फसल दे जिसे सरकार अधिक से अधिक मंडी में मूल्य दे. परिवार धन धान्य से परिपूर्ण रहे क्योंकि हमारी फसल ही हमारी रोजी रोटी होती है. और दूसरा कोई विकल्प नही पेट पालने का.

एक किसान होने के नाते सरकार से हमें यह अपेक्षा है. की वे हमें प्रत्येक वर्ष बिज, खाद और किटकनाशके खरीदने के लिये पिककर्ज दे. किसानो की मेहनत का शोषण न हो इसलिये सरकार उचित मूल्य निर्धारित कर बिचौलियों से बचाये. नहरों नदियों के पानी को शिचाई के लिए उपयोग में देना चाहिये. न कि फ़ैक्टरी के इस्तेमाल में सरकारी कैनाल की व्यवस्था को नहरों से जोड़े.

हमारे बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए सरकार उच्च दर्जा की स्कूल बनवाये. जिससे हमारे बच्चे पढ़ लिख कर साक्षर बने न की हमारी तरह केवल खेती पर आश्रित रहे.

हमारी समस्या और आत्मा की पीड़ा

सबसे बड़ी हमारी किसानों की पीड़ा यह है. कि हम दिन रात एक करके फसल की सुरक्षा करते है. खाद पानी की समस्या से हमारी मेहनत बेकार हो जाती है. हम खेती पूँजी सावकारो से उधार ले कर करते है. उन्हें उधार लिया हुआ पैसा समय पर वापस देना पड़ता है. मगर फसल में पैदावार न होने की वजह से हमे हमारी लागत नही मिल पाती. जिसकारण सावकार का कर्जा चुका नहीं पाते और दिन-प्रतिदिन व्याज बढ़ता ही रहता है. यही कारण है, की आज हम किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते है.

किसान आत्महत्या करे या न करे किसी को हमारी कुर्बानी से कोई मतलब नही. क्या सरकार को हमारी तरफ नही देखना चाहिए? मैं ये बात तब कह रहा हूँ. जब देश के बैंक बड़े-बड़े उद्योगपतिवो को बिज़नेस करने के लिये करोड़ो रुपये का कर्जा आसानी से देती है. लेकिन उद्योगपति कर्ज चुकाने के बजाये सारा पैसा विदेशों में ले जाकर भाग जाते है.

अगर हम भी खेती करना छोड दे. तो देश कि जनता को खाने के लाले पड़ जायेंगे. लेकिन ईश्वर ने हमे इतना निर्दयी नही बनाया हम बंजर भूमि को भी उपजाऊ बनाने में दृढ़ता से लगे रहेंगे. धरती हमारी मा है जिसको हम छोड़ नही सकते और जीवन भर सेवा करेंगे.

निष्कर्ष:- तो आज हमने देश के किसानो के प्रति सन्माम दिखाते हुये इस वेबसाइट के जरिये उनकी व्यथा को आपके सामने रखा. आशा हे की आपको किसान पर आत्मकथात्मक निबंध(किसान की आत्मकथा) यह लेख बहुत पसंद आया होगा. मित्रो अगर आपके मन में भी जरासा किसान के प्रति सन्मान है. तो कृपया इस लेख को सोशल माडिया पर ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिये.

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